Vivekananda(warrior monk)Varanasi

विवेकानंद ने अपना शरीर त्यागने से कुछ दिन पहले अपने आराध्य शिव की नगरी में जहाँ कुछ समय बिताया. ( गोपाल लाल विला) राजा काली कृष्ण ठाकुर का garden house

GOPAL LAL VILLA(VARANASI)

1971 भारत पाकिस्तान युद्ध के   नायक  hero” मानेकशॉ” ने एक बार कहा था कि”भारत की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार,राजनीति-दुर्बलता, जनसंख्या(Corruption, political will ,Population) नहीं वरन जिम्मेदार नेतृत्व का न होना  है”.

सिकंदर ने कहा था कि “मुझे शेरो की उस सेना से डर नहीं लगता जिसका  नेतृत्व एक भेड़िये के हाथ मे हो मुझे  भेडियो की  उस सेना से डर लगता है जिसका नेतृत्व एक  शेर के हाथ मे हो”. इन  बातों से नेतृत्व के महत्व का पता चलता है. परन्तु  लीडर  बनने  के लिए जरूरत होती है त्याग की, बलिदान की. अगर किसी बड़े काम को करने के लिए कोई व्यक्ति  जान देने को तैयार  हो तो  ही  वह सच्चा  लीडर  हो सकता है. विवेकानंद ने 1857 की क्रांति के असफल होने  का प्रमुख कारण  सच्चे  नेतृत्व का अभाव  बताया है इसी  कारण  से शायद , उन्होने  देश  को प्रतेक  क्षेत्र  मे सच्चा  नेतृत्व प्रदान करने वाले लोगो को जागृत  केर देश  सेवा  मे लगा दिया .  

  सैकड़ो वर्ष की गुलामी मे अपने धर्मं, भाषा, संस्कृति,  सभ्यता को हीन (inferior) समझने वाले और कुरीति, आडम्बर, ढकोसला (malpractice ,hypocrisy) को ही धर्म समझने वाले लोगो को किस प्रकार से उन्होनो जागृत (awake) किया, जिम्मेदार नेतृत्व में ये याद दिलाया, की तुम श्रेष्ठ हो किसी से कम नहीं.( तुम शुद्ध हो, मुक्त हो, महान हो) और वर्तमान में उसकी क्या उपयोगिता है जिससे मज़बूत भविष्य की नींव रखी जा सके. “गुलामी बुरी चीज़ है”(slavery is a bad thing) मद्रास में ये बात उन्होने कही जो एक नयी बात थी अभी तो देश में लोगों ने ऐसा सोचना शुरू भी नहीं किया था. वास्तव में स्वामी जी नायको के नायक थे. महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, अरविन्द घोष, निवेदिता, जमशेद जी टाटा, विमल मित्र शचीन्द्रनाथ सान्याल दो बार आजीवन कारावास की सजा पानेवाले (“हिंदुस्तान प्रजातंत्र संगठन” hindustan republican association H.R.A की स्थापना आप ही के द्वारा की गयी, जिनकी पुस्तक क्रांतिकारियों की बाईबिल “बंदी जीवन” के नाम से से जानी जाती थी और जिसका दो दर्जन से ज्यादा भाषा मे अनुवाद हुआ .आगे चलकर त्रैलोक्य चक्रवर्ती ,भगवती चरण वोहरा, चंद्रशेखर आजाद, नलिनी किशोर गुह, बाबा पृथ्वी सिंह, भगत सिंह, रास बिहारी बोस, सुखदेव, राजगुरु, लाला हरदयाल, अजीत सिंह आदि इन के  सहयोगी रहे ). राजनीतिक कारणों  से इस महापुरुष  को हम लगभग भुला ही  चुके हैं. वर्तमान मे अन्ना हजारे, नरेंद्र मोदी और अनगिनत लोगों के विवेकानंद प्रेरणा स्रोत हैं और रहेंगे. अलग अलग क्षेत्र के लोगों को एक व्यक्ति के द्वारा प्रभावित होना एक  दुर्लभ घटना है उन्होने सबसे पहले गरीब,दलित, महिलाओं (poor,depressed) की बात की. अनेक संत आए साधु आए, पर गरीब के बारे  मै ऐसी बाते किसी ने नहीं कही थी “दरिद्र नारायण” गरीब की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है यही मातृभूमि की सेवा है और मातृभूमि की सेवा ही सब से बड़ा कार्य .” विश्व का एक व्यक्ति  भी जब तक भूखा है प्रत्येक  व्यक्ति  तब तक गुनहगार है।“ उन्होने कहा की  हिन्दू धर्म केवल एक बर्तन धर्मं “मुझको मत छुओ”(don’t touch) पर आ कर रुक गया है उस समय हिन्दू धर्म मे खास कर ब्राह्मणो मे छुआछूत का बड़ा बोलबाला था. और सारा धर्म केवल खाने का बर्तन तक  सीमित हो कर रह गया था. किसी दलित के साथ खाना खाना तो दूर उसके बरतन को छू जाने से भी धर्म का नाश हो जाता था, इस प्रकार की परिस्थितियां  ईसाई धर्म प्रचारकों (Christian missionaries) और अंग्रेज़ों को बहुत भाती थी अकाल, गरीबी भूखमरी के कारण बंगाल मे आम लोगों का जीवन बहुत कठिन हो गया था  मृत्यु एक सामान्य घटना थी घर के पुरुष की मृत्यु पूरे परिवार को बेसहारा और लाचार बना देती थी. परिवार के अन्य सदस्य या विधवा हो चुकी औरतों जिनके पास कफन खरीदने के पैसे भी नहीं होते दाह संस्कार का खर्च और धार्मिक आडम्बर पाखंड धर्म भीरू समाज के डर से जीवित रहने के लिए धर्म परिवर्तन का सरल रास्ता अपना लेंती थीं हिन्दू धर्म की कुरीति, आडम्बर, ढकोसला छुआछूत (malpractice ,hypocrisy, untouchability) वास्तव मे हिन्दू धर्म के सबसे बड़े दुश्मन थे ये धर्म की सार्थकता (significance) को दीमक की तरह खा रहे थे. बंगाल के शिक्षित लोग केवल अंग्रेजों की खुशामद करना (flattery)और हिन्दू धर्म की बुराई कर अपने काम का अंत समझ लेते थे. बंगाल और देश के प्रतिष्ठित लोगो का समर्पण बंगाल में होने वाला ईसाई  धर्म परिवर्तन देश की आज़ादी को कितना नुकसान पहुंचाते ये सोच से भी परे है. इसी कारण से महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने भी धर्म परिवर्तन का पुर ज़ोर विरोध किया, अफ्रीका महाद्वीप के अनेक देशों को धर्म प्रचारकों की मदद से फिर प्रशासन के गंदे खेल ने “मूल धर्म”(basic religion)  और “परिवर्तित धर्म”(converted religion) के लोगों में जो आग लगाई कि आज भी अनेक देश उस आग में झुलस रहे हैं .

गृह युद्ध(civil war) में लाखों  लोग मारे जा चुके हैं प्राकृतिक संसाधन(natural-resources) पर अपरोक्ष (through)रूप से यूरोप के देश कब्ज़ा किये बैठे हैं. हिन्दू धर्म मे खुद को श्रेष्ठ समझने का भ्रम पाले बैठी जातियों को अपने सम्बोधन मे कहा की “ये अपने लोग हैं( दलित अछूत) इनसे कैसी नफरत ?जिस दिन तुम्हारे गलत व्यवहार से ये तुम्हारे विरोधी हो गए बचने का रास्ता नहीं मिलेगा .“अपने इन्हीं कामों के कारण स्वामी जी हिन्दू  धर्म के पाखंडी, धर्म का धंधा करने वालों तथा  ईसाई  धर्म प्रचारकों दोनों को खटकने लगे, इन लोगों ने स्वामी जी को उल्टा सीधा कहने और गाली गलौज करने का कोई मौका नहीं छोड़ा. पर स्वामी जी अपने गुरु “रामकृष्ण परमहंस”,के बताए रास्ते पर मुट्ठी भर समर्थित बिना साधन के कुछ युवाओं के साथ देश सेवा और गरीबों और दुखियारों की सेवा मे लगे रहे. अपने  अमेरिका और  इंग्लैंड  प्रवास के समय उन्होने वहां अपनी संस्कृति ,धर्म का सच्चा अर्थ आम  लोगों  तक पहुंचाने  का  काम किया (1893 The parliament of the world’s religions) मे हिन्दू धर्म पर उनके विचार तो “अमृत वचन” हैं .हज़ारों  साल पुरानी हमारी सहिष्णुता,(tolerance) सहनशीलता योग, ध्यान से विश्व को अवगत (aware) कराया यही नहीं ईसाई धर्म प्रचारकों (Christian missionaries)  द्वारा भारत को अँधेरी दुनिया (dark world)और भारतीयों को असभ्य बता कर अमेरिका मे उन्हे सभ्य  बनाने का पुण्य काम (holy work) का दावा और चन्दा इकट्ठा करने की साजिश का भी खुलासा किया, अपने स्वभाव के अनुरूप अमेरिका और यूरोप  के अनेक क्षेत्रों  के विद्वानो को प्रभावित किया. महानतम वैज्ञानिकों मे से एक निकोला टेस्ला, ऐलडस हक्सले,टालस्टॉय,जा डी सेलिंगेर जैसे लेखक रॉकफेलर जैसे धनकुबेर(very rich)  उनके विचारों  से प्रभावित हुए रॉकफेलर जैसे धनकुबेर पूंजीपति का समाज की भलाई के इतनी ज्यादा मात्रा मे धन दान करना अपने आप में  एक अनोखी घटना थी  विवेकानंद को केवल सन्यासी मानना  गलत होगा वो एक योद्धा सन्यासी (warrior monk)थे. एक ऐसा युवा  योद्धा  सन्यासी जो अपने देश के लिए, धर्म, संस्कृति  सभ्यता, भाषा के लिए संपूर्ण  मानवता, के कल्याण के लिए और इनकी रक्षा के लिए आजीवन कहीं  भी लड़ने से पीछे नहीं हटा अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार कहा था कि” मै एक लड़ाकू शांतिप्रिय हूँ,  शान्ति  के लिए मैं  बुरे लोगों से हर वक़्त लड़ने को तैयार रहता हूँ. “विवेकानंद पर भी यह बात उतनी  ही सही बैठती है.

र्तमान में भारत की और विश्व  की अनेक समस्याए हैं- इस्लामिक टेररिज्म , इस्लामिक चरमपंथी,   i.s.i.s का उदय देश मे ईसाई धर्म प्रचारकों, धर्म परिवर्तन का गंदा  खेल, राजनीतिक बैर, वोट  बैंक  की राजनीति, अंधविश्वास, धार्मिक पाखण्ड और  हर शहर गाँव मे फैला पाखण्डियों का मायाजाल (हाल के वर्षों मे बाबा और गुरु जी)लोंगो की कारगुजारियों से  हम सब ही परिचित हैं. ये हमारी संस्कृति सभ्यता के सबसे बड़े दुश्मन हैं.  इन समस्याओं से समाज को किसी योद्धा  की तरह लड़ने की जरुरत है  विवेकानंद की मूर्ति  को माला  पहनाने से कुछ नहीं होगा.  उनके योद्धा की तरह किये गए कामोँ  को आने वाली पीढियों को बताना होगा , और उनकी ही तरह  लड़ना होगा  जब विश्व “सभ्यताओँ के संघर्ष (clash of civilization)” का एक खुला मैदान बन गया हो, तो अपनी सभ्यता संस्कृति  को बचाने  के लिए लड़ना ही पड़ता है. जो अपने महापुरुषों  से इतिहास  से नहीं सीखता उसको सभ्यताओँ के संघर्ष में  जीतने वाली सभ्यता से सीखना पड़ता है और ये सीख  आने वाली पीढियों  को बहुत भारी पड़ती  है.

                                विवेकानंद  और बनारस (वाराणसी)

एक चित्रकार (KRIPA) की कल्पना GOPAL-LAL VILA (1902)

 

GOPAL LAL VILA (VARANASI)

सिस्टर निवेदिता ने एक बार एक घटना का जिक्र करते हुए  बताया की विवेकानंद  की माँ भुवनेश्वरी देवी की एक पुत्र की इच्छा  थी जिस कारण  से बनारस मे अपने एक रिश्तेदार  को उन्होने बीरेश्वर महादेव (शिव मंदिर )में रोज़ उनके लिए पूजा करने का आग्रह किया 12 जनवरी 1863 को पुत्र  होने के बाद इसी कारण  से उसका नाम बीरेश्वर रखा गया परन्तु बोलने मे कठिन होने के कारण नामकरण के समय उनका नाम “नरेंद्र नाथ दत्त” (नरेन्) रखा गया लेकिन अपने घर वालों के लिए वो सदा “बिली” के नाम से ही जाने जाते रहे।  बाद मे अनेकों बार विवेकानंद  का बनारस आना हुआ विवेकानंद भूदेव मुखोपाध्याय, तैलंग-स्वामी से भी मिले.1890 गाजीपुर (बनारस के निकट ) इलाहाबाद भी इनका आना हुआ और इन स्थानों पर समय व्यतीत किया “भय पर विजय की शिक्षा” भी उन्हे यहीं मिली.  दुर्गाकुण्ड  मंदिर  से आते समय बंदरों से सामना होने पर एक साधु के कहने पर आप ने बंदरों से डर   के भागने के स्थान  पर बंदरों को भगाया ये छोटी घटना से स्वामी जी ने सच और डर का सामना करने का का अनोखा पाठ पढ़ा. इस छोटी घटना का उन पर बहुत प्रभाव पड़ा, और इसका जिक्र उन्होने अनेक स्थानों पर किया.  प्रमादादास मित्रा,  जिनसे विवेकानंद  की मित्रता थी, और उनसे उन्होने संस्कृत का भी  ज्ञान लिया था. प्रमादादास मित्रा जी ने गीता का इंग्लिश मे अनुवाद भी  किया था. स्वामी जी वाराणसी आने  पर इनके ही घर रुका करते थे. 1902  मे विवेकानंद  का आना एक  दूसरा अर्थ रखता था, अब वो स्वामी विवेकानंद विश्वप्रसिद्ध ,दार्शनिक और विद्वान थे, परन्तु बेहद कमज़ोर और बीमार, बंगाल के प्रसिद्ध लेखक शंकर ने अपनी किताब the monk  as man में chapter 4पेज 175 ,176  मे  उनकी 31 बिमारियों के बारे मे और  इन बिमारियों से दृहता से लड़ते हुए  सामाजिक भलाई मे लगे रहने का जिक्र  किया है.  स्वामी जी इस बार बनारस आ कर  राजा  काली  कृष्ण ठाकुर  के गार्डन हाउस गोपाल लाल  विला  मे रुके स्थानीय लोग  इस जगह  को सोंधा बास  भी कहते थे  यहाँ विवेकानंद जी लगभग एक महीना तक रुके राजा  काली  कृष्ण ठाकुर  के गार्डन हाउस गोपाल लाल  विला  का अपने पत्रो मे जिक्र करते हुए इस स्थान को स्वास्थ्य के अनुकूल बताया, स्वास्थ्य  ख़राब होने के बाद भी यहाँ  सामाज़िक  गतिविधियों मे लगे लोगों से मिलते रहे  स्वामी जी से प्रभावित हो कर “दरिद्र नारायण सेवा समिति” “poor men’s relief association”  का गठन करने वाले चारु चंद्र दास सहयोगी सदाशिवनन्द(आप ही ने स्वामी जी की इस बार बनारस में आगवानी की और गोपाललाल विला में उनके प्रवास के बारे मे स्वामी विवेकानंद संस्मरण नाम से एक लेख लिखा) लगभग प्रतिदिन मिलने आते थे आप लोगों के अनुरोध पर स्वामी जी ने संगठन का नाम” the Ramakrishna home of service”  कर दिया जो आगे चल कर और वर्तमान में वाराणसी का एक प्रमुख हॉस्पिटल है. समाज सेवा मे लगे उदय प्रताप से भी उनके गार्डन घर पर जा कर मिले.  केदार घाट के पुजारी से भी मुलाकात .की यहाँ से जाने के कुछ महीनों बाद ही(4july 1902) स्वामी जी मृत्यु हो गयी. स्वामी जी के अंतिम दिनों  का साक्षी उनका निवास स्थल वर्तमान मे गोपाल लाल विला एक खण्डहर बन चूका है क्या ही अच्छा होता की सरकार भारत की सांस्कृतिक राजधानी(cultural capital of India) वाराणसी मे इस खण्डहर को एक धरोहर रूप प्रदान करती, भारत की सांस्कृतिक राजधानी मे  भारत की संस्कृति को बचाने वाले और सम्पूर्ण विश्व को भारत की संस्कृति से परिचित कराने वाले योद्धा सन्यासी (warrior monk) विवेकानंद की इस धरोहर को बचाने का प्रयास तो होना ही चाहिए. वाराणसी  का पुराना नाम काशी है जिसका अर्थ होता है प्रकाश.  पर यहाँ प्रकाश का अर्थ ज्ञान से है कृत्रिम प्रकाश से नहीं. मालवीय जी ने भी वाराणसी को सर्व विद्या की राजधानी कहा था. गौतम बुद्ध महावीर स्वामी, कबीर, तुलसी, न जाने कितनो को इस शहर ने प्रभावित  किया देश ही नहीं विदेश मार्क ट्वेन,  स्टीव जॉब्स, जॉर्ज हैरिसन इस शहर से प्रेरणा लेते रहे. इस प्रकार से न जाने  कितने अनगिनत व्यक्तियों  प्रेरणा देने वाले शहर मे अनगिनत व्यक्तियों को प्रेरित करने वाले व्यक्ति का स्मारक  एक  पुनीत कार्य(holy work) होगा और ये स्वामी जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि.(tribute)