हिन्दू कमांडो (निहंग -सिख ) और उनकी विचित्र शब्दावली (Hindu commandos (Nihang-sikh) and their peculiar vocabulary)

वैसे तो सिख शब्द ही वीरता , त्याग और बलिदान का पर्याय है. हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सिखों का बलिदान कभी भुलाया नहीं जा सकता।


आज मैं यहाँ बात कर रहा हूँ ” निहंग सिख” की।(अकाली ) निहंग शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है” मगरमच्छ “. मुग़ल इतिहासकारों ने अकाली सेना से अपनी नफरत के कारण अकाली सेना के लिए इस शब्द का उपयोग किया था , वैसे निहंग सिखों की कार्य-प्रणाली भी मगरमच्छ के ही समान थी।
मगरमच्छ को जैसे एक आलसी जीव समझा जाता है , पर ये आलसी नहीं होता अपनी सारी शक्ति शिकार के लिए बचा कर रखता है और अपने शिकार पर पूरी ताकत से अचानक , हमला करता है वैसे ही निहंग सिख भी अपने दुश्मनों पर हमला करने के लिए जाने जाते थे।
हिन्दू धर्म रक्षा के लिए सिख सेना को मुग़लों से अनेक लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी। ऐसे बहुत से युद्ध में सिख सेना की मदद के लिए निहंग सिख मुग़ल सेना पर अचानक , बेहद जोरदार हमला किया करते थे जिससे मुग़ल सेना तितर -बितर हो जाती थी। रामजन्म भूमि के लिए युद्ध में निहंग सिखों ने औरंगजेब की सेना को पराजित किया था। 1858 में भी निहंग सिखों ने यहाँ पूजा-अर्चना की थी।
निहंग सिख बोल-चाल की भाषा में भी स्त्री -लिंग शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। उनका विश्वास था की इससे कमज़ोरी का भाष होता था इसके अतिरिक्त अन्य दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले शब्दों से निहंग सिखों के त्याग और कठोर जीवन की जानकारी मिलती है।


पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध साहित्यकार बलवन्त सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दो अकाल गढ़” में इन शब्दों का बड़ी खूबसूरती से बयां किया है।
कुछ प्रचलित शब्द :


जय-कारा —– वाहे गुरु दी खालसा वाहे गुरु दि फतह के आसमान को गुँजा देने वाले नारों के साथ दुश्मन पर हमला किया जाता था , गुरुद्धारे में दर्शन के समय भी इसका प्रयोग होता था
बोला — बोली के स्थान पर
मीठे पराठे — कई दिनों की बासी रोटी
लड़ाकू ——- मिर्च
झटंगा —— बकरी का मांस हलाल (इस्लामिक तरीके से मारे गए मांस का खाना निहंग सिखों मे मना था ये झटका मांस ही खाते थे
मौज़ा — अपनी कठिन दिनचर्या को ही सबसे बड़ी ख़ुशी मान कर इसे मौज़ में रहना कहते थे